System Movie Review आज के दौर में जब कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों की भरमार है, तब कोई भी नई फिल्म तभी ध्यान खींच पाती है जब वह कुछ नया कहने की हिम्मत दिखाए। लेकिन Ashwini Iyer Tiwari की फिल्म “System”, जो Prime Video पर रिलीज हुई है, एक ऐसे सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है जो जितना गहरा है, उतना ही उलझा हुआ भी—क्या अदालत का फैसला हमेशा न्याय के बराबर होता है?
फिल्म का आइडिया दमदार है, लेकिन उसकी प्रस्तुति कई जगहों पर भावनाओं को पकड़ने की कोशिश में तर्क और गहराई खो देती है।
कहानी की झलक: सत्ता, कानून और परिवार का टकराव
फिल्म की शुरुआत होती है Sonakshi Sinha द्वारा निभाई गई नेहा राजवंश से, जो एक हाई-प्रोफाइल वकील परिवार से आती हैं। उनके पिता रवि राजवंश, जिनका किरदार Ashutosh Gowariker निभाते हैं, एक बेहद सफल और प्रभावशाली वकील हैं।
नेहा सरकारी अभियोजक (Public Prosecutor) के तौर पर अपने करियर की शुरुआत करती है और उसे खुद को साबित करने के लिए लगातार केस जीतने की चुनौती मिलती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात होती है एक साधारण दिखने वाली लेकिन बेहद समझदार स्टेनोग्राफर सरिका रावत से, जिसे Jyothika निभाती हैं।
दोनों की दुनिया अलग है, लेकिन किस्मत उन्हें एक साथ लाकर कोर्टरूम की जंग में उतार देती है।
फिल्म का मुख्य विचार: न्याय बनाम सिस्टम
“System” केवल एक क्राइम या कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाती है कि—
- क्या कानून हमेशा न्याय देता है?
- क्या सबूत ही सच का अंतिम प्रमाण हैं?
- क्या अमीर और प्रभावशाली लोग सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ सकते हैं?
फिल्म इन सवालों को उठाती जरूर है, लेकिन कई जगहों पर जवाब देने की बजाय भावनात्मक ड्रामा पर ज्यादा भरोसा करती है।
अभिनय: मजबूत कलाकार, लेकिन सीमित असर
Sonakshi Sinha का प्रदर्शन
Sonakshi ने नेहा के किरदार में परिपक्वता दिखाई है। खासकर उनके भावनात्मक और रिलेशनशिप वाले सीन में उनका अभिनय बेहतर लगता है। लेकिन बड़े कोर्टरूम ड्रामेटिक मोमेंट्स में उनका प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है।
Jyothika का किरदार
Jyothika का किरदार सरिका रावत कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन उनका प्रदर्शन काफी हद तक एक जैसा (monotone) महसूस होता है। उनकी भावनात्मक गहराई को और बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था।
Ashutosh Gowariker का रोल
Ashutosh Gowariker एक सख्त और प्रभावशाली वकील के रूप में स्क्रीन पर प्रभाव छोड़ते हैं। उनका किरदार नैतिकता और शक्ति के बीच झूलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें पूरी तरह से विकसित नहीं कर पाती।
निर्देशन और लेखन: मजबूत विचार, कमजोर पकड़
Ashwini Iyer Tiwari को हमेशा से भावनात्मक कहानियाँ कहने के लिए जाना जाता है। उनकी फिल्मों में अक्सर “अंडरडॉग” यानी कमजोर वर्ग के किरदार केंद्र में होते हैं।
लेकिन “System” में समस्या यह है कि कहानी का बेस मजबूत होने के बावजूद उसका निष्पादन कई जगहों पर बहुत सिंपल और अनुमानित हो जाता है। फिल्म गंभीर सवाल उठाती है, लेकिन उन्हें उतनी गहराई से explore नहीं कर पाती जितनी जरूरत थी।
कोर्टरूम ड्रामा का असर क्यों कमजोर पड़ता है?
कोर्टरूम ड्रामा तभी असरदार होता है जब उसमें—
- तर्क की मजबूती हो
- नैतिक दुविधाएँ गहरी हों
- और अंत तक सस्पेंस बना रहे
“System” इन सभी तत्वों को शामिल करने की कोशिश करती है, लेकिन अंत में कहानी एक पारंपरिक और अनुमानित दिशा में चली जाती है, जिससे उसका असर कम हो जाता है।
थीम और संदेश
फिल्म का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सिस्टम हमेशा निष्पक्ष नहीं होता। लेकिन यह संदेश नया नहीं है। फिल्म कई जगहों पर यह संकेत देती है कि सत्ता और भ्रष्टाचार न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, लेकिन यह विचार पहले भी कई फिल्मों में देखा जा चुका है।
कमजोरियां: कहाँ चूक गई फिल्म?
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका “over-dramatization” है। कई सीन जरूरत से ज्यादा भावनात्मक बनाए गए हैं, जिससे कहानी की असली ताकत दब जाती है।
इसके अलावा, अंतिम हिस्से में कहानी एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है, जो कई दर्शकों को कृत्रिम (forced) लग सकता है। यही वजह है कि फिल्म अपने ही बनाए हुए वादे को पूरा नहीं कर पाती।
निष्कर्ष: एक अच्छा विचार, अधूरी प्रस्तुति
“System” एक ऐसी फिल्म है जिसमें विचार तो मजबूत हैं, लेकिन उन्हें पर्दे पर उतारने का तरीका उतना प्रभावी नहीं है। यह फिल्म सोचने पर मजबूर करती है, लेकिन गहराई तक प्रभावित नहीं कर पाती।
अंत में कहा जा सकता है कि यह एक ऐसी कोर्टरूम ड्रामा है जो “कागज़ पर बेहतर” लगती है, लेकिन स्क्रीन पर उतनी प्रभावशाली नहीं बन पाती।

