Crude Oil Price Fall: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट ने वैश्विक निवेशकों के साथ-साथ भारत जैसे बड़े आयातक देशों को राहत की उम्मीद दी है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने तेल बाजार में हलचल मचा दी, जिसके चलते ब्रेंट और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई।
बीते कुछ हफ्तों से मध्य-पूर्व में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचाई पर थीं। लेकिन अब कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों ने बाजार की दिशा बदल दी है।
कच्चे तेल की कीमतों में कितनी गिरावट आई?
सोमवार को इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड करीब 6 फीसदी तक गिर गया और इसकी कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल गई। भारतीय समयानुसार सुबह करीब 10:30 बजे ब्रेंट क्रूड 97.74 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड भी 5.82 फीसदी गिरकर 90.98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
यह गिरावट पिछले दो हफ्तों में सबसे निचले स्तर को दर्शाती है। कारोबार के दौरान दोनों बेंचमार्क 7 मई के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।
क्यों गिरे कच्चे तेल के दाम?
अमेरिका-ईरान शांति समझौते की उम्मीद
तेल की कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबर है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच समझौते को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है।
अगर यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुल सकता है, जिससे तेल आपूर्ति सामान्य होने लगेगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
दुनिया के करीब एक-तिहाई कच्चे तेल और एलएनजी की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। युद्ध के कारण यहां आपूर्ति बाधित होने से कीमतों में भारी उछाल आया था।
अब अगर यह रास्ता दोबारा पूरी तरह खुलता है तो बाजार में सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा।
कुछ हफ्ते पहले 115 डॉलर तक पहुंच गया था तेल
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस महीने की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
युद्ध शुरू होने से पहले इसकी कीमत 60 से 70 डॉलर के बीच थी। यानी कुछ ही समय में इसमें भारी तेजी देखी गई थी।
अब 4 मई से 25 मई के बीच करीब 15 फीसदी की गिरावट आई है, जो बाजार में राहत का संकेत देती है।
क्या संकट पूरी तरह टल गया है?
विशेषज्ञों की राय
विश्लेषकों का कहना है कि भले ही समझौता हो जाए, लेकिन तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा।
ऊर्जा बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की मरम्मत और सप्लाई चैन को पटरी पर आने में कई महीने लग सकते हैं।
मॉर्गन स्टेनली की चेतावनी
ब्रोकरेज फर्म Morgan Stanley का मानना है कि अगर जून के बाद भी होर्मुज जलमार्ग सामान्य नहीं हुआ तो वैश्विक बाजार में तेल संकट दोबारा गहरा सकता है।
इससे कीमतें फिर तेजी से ऊपर जा सकती हैं।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
तेल कंपनियों को राहत
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट से भारतीय तेल कंपनियों का घाटा कम हो सकता है।
बीते कुछ महीनों में कंपनियां लगातार बढ़ती लागत से जूझ रही थीं।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर
सोमवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इस साल चौथी बार बढ़ोतरी की है।
अगर कच्चा तेल लगातार सस्ता होता है तो कंपनियों पर दबाव कम होगा और आगे कीमतें स्थिर रह सकती हैं।
इससे आम लोगों को राहत मिल सकती है और महंगाई पर भी असर पड़ेगा।
क्या भारत में जल्द मिल सकती है राहत?
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं तो सरकार और तेल कंपनियां उपभोक्ताओं को राहत देने पर विचार कर सकती हैं।
हालांकि इसमें टैक्स नीति, रुपये की स्थिति और वैश्विक बाजार की स्थिरता जैसे कई फैक्टर असर डालेंगे।
आगे क्या रहेगा तेल बाजार का रुख?
फिलहाल बाजार की नजर अमेरिका-ईरान बातचीत पर टिकी हुई है।
अगर समझौता सफल रहा तो तेल कीमतों में और गिरावट आ सकती है। लेकिन किसी भी नई भू-राजनीतिक हलचल से बाजार दोबारा अस्थिर हो सकता है।
निष्कर्ष
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह गिरावट वैश्विक बाजार के लिए राहत का संकेत है। अमेरिका-ईरान शांति समझौते की उम्मीदों ने बाजार में सकारात्मक माहौल बनाया है।
भारत जैसे देशों के लिए यह खबर राहत लेकर आई है क्योंकि इससे महंगाई और ईंधन कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। हालांकि आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीतिक हालात ही तय करेंगे कि यह राहत स्थायी होगी या नहीं।

