Nepal government’s major decision: विवादित सोशल मीडिया बिल वापस लिया, युवाओं (Gen Z) के विरोध के आगे झुकी सत्ता

Channelindiaone
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काठमांडू: नेपाल की अंतरिम सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी के हित में एक बड़ा कदम उठाते हुए संसद से उस विवादित ‘सोशल मीडिया बिल’ को वापस लेने का फैसला किया है, जिसे लेकर पिछले साल देश भर में भारी बवाल मचा था। केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली पिछली सरकार द्वारा लाए गए इस बिल को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार माना जा रहा था।

कैबिनेट की बैठक में हुआ फैसला

सरकार के प्रवक्ता और गृह मंत्री ओम प्रकाश अर्याल ने मंगलवार को पत्रकारों को जानकारी दी कि कैबिनेट की हालिया बैठक में इस बिल को वापस लेने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

युवाओं (Gen Z) के प्रदर्शनों ने बदली थी सत्ता की तस्वीर

यह फैसला उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों की याद दिलाता है, जिन्होंने नेपाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी।

  • प्रतिबंध की शुरुआत: पिछले साल सितंबर में ओली सरकार ने फेसबुक (Meta), एक्स (Twitter), यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे लगभग 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया था।

  • युवाओं का गुस्सा: सरकार के इस फैसले के खिलाफ नेपाल की युवा पीढ़ी (Gen Z) सड़कों पर उतर आई थी।

  • सत्ता परिवर्तन: शुरुआती सोशल मीडिया विरोध धीरे-धीरे भ्रष्टाचार विरोधी जन-आंदोलन में बदल गया। युवाओं के इस बढ़ते दबाव के कारण अंततः शक्तिशाली मानी जाने वाली ओली सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था।

क्यों हो रहा था इस बिल का विरोध?

तत्कालीन संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने 28 जनवरी, 2025 को राष्ट्रीय सभा में यह विधेयक पेश किया था। जानकारों और पत्रकार संगठनों का मानना था कि:

  1. अभिव्यक्ति पर लगाम: इस बिल के जरिए सरकार सोशल मीडिया पर होने वाली आलोचनाओं को नियंत्रित करना चाहती थी।

  2. कठोर नियम: सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नेपाल में पंजीकरण अनिवार्य करने जैसे नियमों को लेकर डिजिटल राइट्स ग्रुप्स ने चिंता जताई थी।

  3. स्वतंत्रता का हनन: ‘नेपाल पत्रकार महासंघ’ ने भी इसे प्रेस की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के बोलने के अधिकार के खिलाफ बताया था।

लोकतंत्र की जीत

नेपाल के युवाओं की मुख्य मांग सोशल मीडिया से प्रतिबंध हटाना और शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना था। अंतरिम सरकार द्वारा इस बिल को वापस लेना न केवल युवाओं की जीत मानी जा रही है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सर्वोपरि है।

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