O Romeo Movie Review: हिंदी सिनेमा में जब भी गहरे प्रेम, हिंसा और शायरी का मेल होता है, तो सबसे पहले नाम आता है Vishal Bhardwaj का। उनकी नई फिल्म ‘O’ Romeo’ भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फिल्म दर्शकों के दिल तक पहुंच पाती है, या फिर सिर्फ एक लंबा प्रयोग बनकर रह जाती है?
इस फिल्म में रोमांस, अंडरवर्ल्ड, बदले की आग और शेक्सपीयरियन ट्रैजेडी का मिश्रण देखने को मिलता है, लेकिन इसकी प्रस्तुति कई जगह कमजोर पड़ जाती है।
कहानी की जड़ें: शेक्सपीयर से मुंबई तक
‘O’ Romeo’ की कहानी कहीं न कहीं William Shakespeare की अमर रचना Romeo and Juliet से प्रेरित नजर आती है। फर्क बस इतना है कि यहां वेरोना की बालकनियां नहीं, बल्कि मुंबई का अंडरवर्ल्ड है।
फिल्म में अफ़शां और उस्तारा के बीच होने वाली बातचीत यह साफ करती है कि विशाल भारद्वाज बॉलीवुड की गलियों में रहते हुए भी अपनी “शेक्सपीयराना” सोच को नहीं छोड़ते। यह प्रयोग दिलचस्प है, लेकिन हर बार असरदार नहीं हो पाता।
साथ ही, फिल्म में Quentin Tarantino की स्टाइलिश हिंसा की झलक भी देखने को मिलती है, जो कभी रोमांचक लगती है तो कभी जरूरत से ज्यादा।
अंडरवर्ल्ड और प्रेम की उलझी हुई कहानी
फिल्म की कहानी गैंगस्टर हुसैन उस्तारा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे निभाया है Shahid Kapoor ने। यह किरदार काफी हद तक पत्रकार Hussain Zaidi की किताब Mafia Queens of Mumbai से प्रेरित है।
उस्तारा एक ऐसा हिटमैन है, जो सरकारी एजेंसियों के लिए भी काम करता है और खुद के अतीत से भी लड़ रहा है। इसी दौरान उसकी मुलाकात अफ़शां से होती है, जो अपने प्यार की हत्या का बदला लेना चाहती है।
यहां से दोनों की कहानी प्यार और बदले के बीच फंस जाती है, लेकिन फिल्म इस भावनात्मक संघर्ष को पूरी गहराई से दिखाने में चूक जाती है।
Tripti Dimri का अफ़शां: मजबूत लेकिन अधूरा किरदार
फिल्म में अफ़शां का किरदार निभाया है Tripti Dimri ने। उन्होंने अपने अभिनय से यह साबित किया है कि वे भावनात्मक सीन में काफी सक्षम हैं।
अफ़शां एक ऐसी लड़की है जो नुकसान झेल चुकी है और बदले की आग में जल रही है। त्रिप्ति इस दर्द को स्क्रीन पर अच्छे से उतारती हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण उनका किरदार पूरी तरह निखर नहीं पाता।
कई जगह ऐसा लगता है कि अफ़शां की भावनाएं जल्दी-जल्दी बदलती हैं, जिससे दर्शक उससे पूरी तरह जुड़ नहीं पाते।
Shahid Kapoor की दमदार मौजूदगी
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं Shahid Kapoor। उनकी एंट्री दमदार है और स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी बेहद प्रभावशाली लगती है।
एक्शन हो या इमोशनल सीन, शाहिद हर जगह खुद को साबित करते हैं। खासतौर पर Disha Patani के साथ उनका गाना और Nana Patekar के साथ उनकी नोकझोंक दर्शकों को बांधे रखती है।
यह फिल्म काफी हद तक शाहिद के अभिनय की शो-रील बनकर रह जाती है।
विलेन और सपोर्टिंग कास्ट का प्रदर्शन
फिल्म में मुख्य विलेन का रोल निभाया है Avinash Tiwary ने। उनका किरदार जलाल एक आतंकवादी बन चुका गैंगस्टर है, जो उस्तारा से बदला लेना चाहता है।
हालांकि अविनाश अपनी भूमिका में ईमानदार हैं, लेकिन उनका किरदार प्रभावशाली खलनायक बनने से पहले ही कमजोर पड़ जाता है।
वहीं Tamannaah Bhatia और Farida Jalal जैसे कलाकारों को भी सीमित मौके मिले हैं।
पुराने जादू की कमी
अगर विशाल भारद्वाज की पिछली फिल्मों Kaminey और Haider से तुलना करें, तो ‘O’ Romeo’ काफी कमजोर नजर आती है।
इन फिल्मों में जो भावनात्मक गहराई और अराजकता थी, वह यहां गायब है। कहानी लंबी है, लेकिन प्रभाव कम है। 179 मिनट की फिल्म कई बार खिंची हुई लगती है।
संगीत और शायरी: Gulzar की चमक
फिल्म के गीतों में Gulzar की शायरी जान डालती है। कुछ पंक्तियां सीधे दिल को छूती हैं।
हालांकि, खूबसूरत गीतों के बावजूद कहानी में वह भावनात्मक “फीवर” नहीं आ पाता, जिसकी उम्मीद की जाती है।
प्रोडक्शन और प्रस्तुति
फिल्म को प्रोड्यूस किया है Sajid Nadiadwala ने। बड़े स्तर पर बनी इस फिल्म में सेट, एक्शन और सिनेमैटोग्राफी तो शानदार है, लेकिन बारीकियों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।
कहानी में Dawood Ibrahim जैसे अंडरवर्ल्ड किरदारों की झलक मिलती है, लेकिन यह सब सतही स्तर पर ही रह जाता है।
निष्कर्ष: अच्छी कोशिश, अधूरा असर
‘O’ Romeo’ एक महत्वाकांक्षी फिल्म है, जिसमें प्यार, बदला और हिंसा को जोड़ने की कोशिश की गई है। शाहिद कपूर और त्रिप्ति डिमरी का अभिनय सराहनीय है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट और असंतुलित कहानी फिल्म को ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचा पाती।
यह फिल्म विशाल भारद्वाज के पुराने प्रशंसकों को थोड़ा निराश कर सकती है, लेकिन शाहिद के फैंस के लिए यह एक बार देखने लायक जरूर है।

