Drishyam 3 Review: मलयालम सिनेमा की सबसे चर्चित थ्रिलर फ्रेंचाइजी Drishyam ने भारतीय सिनेमा में सस्पेंस और फैमिली ड्रामा का नया स्तर तय किया था। साल 2013 में आई पहली फिल्म और फिर 2021 में रिलीज हुई Drishyam 2 ने दर्शकों को चौंका दिया था। दोनों फिल्मों ने जिस तरह से कहानी को मोड़ा और अंत में दर्शकों को हैरान किया, उसने इस फ्रेंचाइजी को एक अलग पहचान दी।
अब लंबे इंतजार के बाद Jeethu Joseph एक बार फिर Drishyam 3 लेकर आए हैं। जाहिर है उम्मीदें बहुत ऊंची थीं। हर किसी के मन में यही सवाल था कि क्या इस बार भी जॉर्जकुट्टी पुलिस को मात दे पाएगा या सच सामने आ जाएगा?
फिल्म इन्हीं सवालों के साथ शुरू होती है और दर्शकों को एक बार फिर उसी दुनिया में ले जाती है जहां हर चेहरा एक राज छिपाए बैठा है।
Drishyam 3 की कहानी: डर अभी भी खत्म नहीं हुआ
सामान्य जिंदगी की कोशिश, लेकिन अतीत पीछा नहीं छोड़ता
फिल्म की शुरुआत में जॉर्जकुट्टी और उसका परिवार एक सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करता दिखता है। कभी केबल ऑपरेटर रहा जॉर्जकुट्टी अब सफल फिल्म निर्माता बन चुका है। उसने अपनी असली जिंदगी पर आधारित फिल्म बनाई है जो बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ का बड़ा कारोबार करती है।
बाहर से सब कुछ शानदार दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर परिवार अब भी उसी डर में जी रहा है कि कहीं पुराना सच सामने न आ जाए।
रानी अब अपनी बड़ी बेटी अंजू की शादी को लेकर परेशान है। अंजू अब भी मानसिक तनाव से गुजर रही है और इलाज करा रही है। समाज में फैली अफवाहें उसकी शादी में बड़ी बाधा बनती हैं। दूसरी तरफ जॉर्जकुट्टी को लगातार महसूस होता है कि कोई फिर से उसके खिलाफ सबूत जुटा रहा है।
यहीं से कहानी रहस्य और तनाव की तरफ बढ़ती है।
स्क्रीनप्ले इस बार थोड़ा कमजोर पड़ता है
धीमी शुरुआत दर्शकों की परीक्षा लेती है
Jeethu Joseph ने पहले दो पार्ट्स की तरह यहां भी कहानी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया है। लेकिन जहां पहले यह धीमापन रोमांच पैदा करता था, वहीं इस बार कई हिस्सों में कहानी खिंची हुई महसूस होती है।
पहला हाफ काफी स्लो है। कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म पुराने किरदारों को सिर्फ याद दिलाने के लिए वापस ला रही है। सस्पेंस वाले वे बड़े मोड़, जिनकी पहचान Drishyam फ्रेंचाइजी रही है, इस बार कम दिखाई देते हैं।
फिल्म असली पकड़ क्लाइमैक्स के करीब जाकर बनाती है। अंतिम 30-40 मिनट वही रोमांच पैदा करते हैं जिसकी उम्मीद दर्शक पूरी फिल्म में करते हैं।
अगर पूरी फिल्म में यही कसावट होती तो यह पिछली फिल्मों की बराबरी कर सकती थी।
मोहनलाल ने फिर साबित किया कि क्यों हैं सुपरस्टार
जॉर्जकुट्टी के दर्द को आंखों से बयां कर देते हैं
अगर Drishyam 3 देखने की सबसे बड़ी वजह कोई है तो वह हैं Mohanlal।
इस बार उनका जॉर्जकुट्टी पहले जैसा चालाक और आत्मविश्वासी जरूर है, लेकिन उम्र और डर ने उसे भीतर से थका दिया है। मोहनलाल इस बदलाव को बेहद सहज तरीके से पर्दे पर उतारते हैं।
उनकी खामोशी, थकी हुई आंखें और छोटे-छोटे हावभाव बताते हैं कि यह आदमी सालों से एक बोझ ढो रहा है।
फिल्म बार-बार दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि जॉर्जकुट्टी हीरो है या विलेन। लेकिन एक पिता के तौर पर उसकी मजबूरी दर्शकों को उससे जोड़ देती है।
बाकी कलाकारों ने भी निभाया दमदार साथ
मीना और दोनों बेटियों का परिपक्व अभिनय
Meena ने रानी के किरदार में शानदार काम किया है। अब वह सिर्फ डरी हुई पत्नी नहीं बल्कि अपनी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंतित मां भी हैं।
Ansiba Hassan और Esther Anil दोनों पहले से ज्यादा परिपक्व दिखती हैं। उनके अभिनय में किरदारों की मानसिक थकान साफ झलकती है।
तकनीकी पक्ष मजबूत, लेकिन एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के मूड को खूबसूरती से पकड़ती है। कैमरा वर्क पुराने Drishyam वाले माहौल को बनाए रखता है।
बैकग्राउंड स्कोर कई सीन में तनाव को बढ़ाता है और दर्शकों को सीट से बांधे रखता है।
हालांकि एडिटिंग थोड़ी और टाइट होती तो फिल्म की लंबाई कम होकर असर ज्यादा गहरा हो सकता था।
क्या Drishyam 3 पहले दो पार्ट्स जितनी दमदार है?
इस सवाल का जवाब थोड़ा मिश्रित है।
अगर आप पहले दो पार्ट्स जैसे लगातार झटके देने वाले ट्विस्ट की उम्मीद से जाएंगे तो शायद थोड़ा निराश हों।
लेकिन अगर आप जॉर्जकुट्टी की कहानी का भावनात्मक अंत देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको संतुष्ट करेगी।
यह ज्यादा थ्रिलर नहीं बल्कि एक ऐसे इंसान की कहानी है जो अपने परिवार को बचाने की कीमत चुका रहा है।
फिल्म का सबसे बड़ा सवाल: परिवार के लिए कितनी दूर जाना सही है?
Drishyam 3 यही सवाल उठाती है कि क्या अपने परिवार की रक्षा के लिए हर सीमा पार करना सही है?
फिल्म कोई सीधा जवाब नहीं देती। यही इसकी खूबसूरती है। दर्शक खुद तय करते हैं कि जॉर्जकुट्टी सही है या गलत।
निष्कर्ष: देखनी चाहिए या नहीं?
Drishyam 3 अपने पहले दो पार्ट्स जैसी धारदार थ्रिलर नहीं है, लेकिन यह जॉर्जकुट्टी की यात्रा को एक भावनात्मक और प्रभावशाली मुकाम देती है।
मोहनलाल का अभिनय फिल्म की जान है। धीमा स्क्रीनप्ले थोड़ी निराशा देता है, लेकिन क्लाइमैक्स और भावनात्मक गहराई इसकी भरपाई कर देते हैं।
अगर आपने पहले दो पार्ट्स देखे हैं तो इसे मिस नहीं करना चाहिए। यह एक पिता की लड़ाई की ऐसी कहानी है जो आखिर तक आपको बांधे रखती है।
रेटिंग: 3.5/5 ⭐⭐⭐½

