Rajasthan Desk : Zoya Khan
राजस्थान में औसत से 156% अधिक बारिश के बावजूद 70% से ज्यादा भूजल स्रोत खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं। खराब जल प्रबंधन और कृषि पद्धतियों को माना जा रहा मुख्य कारण।
राजस्थान में बढ़ता भूजल संकट, चिंताजनक स्थिति
राजस्थान में जल संकट अब एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 70% से अधिक भूजल स्रोत ‘ओवरएक्सप्लॉइटेड’ यानी अत्यधिक दोहन की श्रेणी में आ चुके हैं। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों में जितना पानी जमीन से निकाला जा रहा है, उससे कहीं कम मात्रा में उसका पुनर्भरण (रिचार्ज) हो पा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह स्थिति उस समय बनी है जब राज्य में हाल के मानसून सीजन के दौरान औसत से 156% अधिक बारिश दर्ज की गई थी। इसके बावजूद जल स्तर में सुधार नहीं होना कई सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान में निकाले जाने वाले भूजल का लगभग 85% हिस्सा खेती में उपयोग हो रहा है। धान और गेहूं जैसी अधिक पानी लेने वाली फसलों, गहरे बोरवेलों और कमजोर जल प्रबंधन व्यवस्था ने हालात को और गंभीर बना दिया है। राज्य में जून से सितंबर के बीच 678.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा जमीन में समाने के बजाय बह गया। पर्याप्त रिचार्ज संरचनाओं की कमी और अनियंत्रित दोहन के कारण भूजल भंडार नहीं सुधर सके। चिंता की बात यह है कि संकट सिर्फ मरुस्थलीय जिलों तक सीमित नहीं है। दौसा और सवाई माधोपुर जैसे अपेक्षाकृत बेहतर वर्षा वाले जिलों में भी अधिकांश ब्लॉक ओवरएक्सप्लॉइटेड बताए गए हैं. इसका असर पीने के पानी, खेती की लागत, ग्रामीण आजीविका और जल गुणवत्ता पर पड़ सकता है। कई इलाकों में लवणता, फ्लोराइड और अन्य प्रदूषकों की समस्या भी बढ़ती दिख रही है।
‘ओवरएक्सप्लॉइटेड’ का मतलब क्या है?
जब किसी क्षेत्र में भूजल का दोहन उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक हो जाता है, तो उसे ओवरएक्सप्लॉइटेड कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो:
- जितना पानी धरती के नीचे जमा हो रहा है
- उससे ज्यादा पानी लोग निकाल रहे हैं
ऐसी स्थिति लंबे समय तक रहने पर भूजल स्तर लगातार नीचे जाता है, कुएं और हैंडपंप सूखने लगते हैं, बोरिंग की गहराई बढ़ती जाती है और पानी की गुणवत्ता भी खराब होने लगती है।
राजस्थान में संकट की सबसे बड़ी वजह क्या है?
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा कारण कृषि क्षेत्र में भूजल पर अत्यधिक निर्भरता माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में निकाले जाने वाले भूजल का लगभग 85% हिस्सा खेती में इस्तेमाल हो रहा है।
इसका मतलब क्या है?
राजस्थान जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क राज्य में खेती का बड़ा हिस्सा अभी भी ट्यूबवेल आधारित सिंचाई पर टिका है। कई इलाकों में किसान ऐसे फसली पैटर्न अपना रहे हैं जिनमें पानी की मांग बहुत अधिक होती है।
ज्यादा पानी लेने वाली फसलें
रिपोर्ट में खास तौर पर धान और गेहूं जैसी फसलों का जिक्र है, जिनके लिए काफी पानी चाहिए। ऐसे इलाकों में भी ये फसलें उगाई जा रही हैं जहां भूजल पहले से दबाव में है।
कौन-कौन से इलाके ज्यादा प्रभावित हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक यह संकट सिर्फ कम बारिश वाले मरुस्थलीय जिलों तक सीमित नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि अच्छी वर्षा वाले जिलों में भी भूजल इकाइयाँ ओवरएक्सप्लॉइटेड पाई गई हैं। उदाहरण के तौर पर दौसा और सवाई माधोपुर जैसे जिलों में भी अधिकांश ब्लॉक इस श्रेणी में बताए गए हैं।
दूसरी ओर:
- गंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे इलाकों में नहर आधारित खेती के बावजूद पानी की खपत बहुत अधिक है
- जोधपुर और बाड़मेर जैसे पश्चिमी जिलों में गहरे बोरवेलों पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है
यानी समस्या पूरे राज्य में अलग-अलग रूप में मौजूद है।
राजस्थान के लिए आगे खतरे क्या हैं?
यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में राजस्थान को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, अभी जो क्षेत्र ओवरएक्सप्लॉइटेड हैं, वे और गंभीर श्रेणी में जा सकते हैं और पेयजल योजनाओं पर दबाव बढ़ेगा
सरकारी जलापूर्ति परियोजनाओं को अधिक दूर से पानी लाना पड़ सकता है। यह संभावना वर्तमान संकट की प्रकृति से निकलती है।
कृषि संकट गहरा सकता है
भूजल आधारित खेती अस्थिर होती जाएगी, जिससे उत्पादन और किसान आय प्रभावित हो सकती है।
सामाजिक और आर्थिक असर
पानी को लेकर स्थानीय तनाव, पलायन और ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ सकता है। यह जल संकट के स्थापित प्रभावों के अनुरूप एक युक्तिसंगत निष्कर्ष है।
विशेषज्ञ क्या समाधान बता रहे हैं?
रिपोर्ट में इस संकट से निपटने के लिए कई बड़े हस्तक्षेपों की जरूरत बताई गई है। इनमें प्रमुख हैं:
1. भूजल निकासी पर सख्त नियंत्रण
जहां दोहन बहुत अधिक है, वहां अनियंत्रित बोरवेल और ट्यूबवेल पर निगरानी जरूरी है।
2. माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा
ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें पानी की बचत कर सकती हैं, खासकर सूखे क्षेत्रों में।
3. फसल विविधीकरण
धान और गेहूं जैसी अधिक पानी लेने वाली फसलों की जगह कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा।
4. वर्षा जल संचयन
शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को सख्ती से लागू करना होगा।
5. सतही जल स्रोतों का बेहतर उपयोग
जहां संभव हो, नहर, तालाब, बांध और अन्य सतही जल प्रणालियों को मजबूत बनाकर भूजल पर दबाव कम किया जा सकता है।
6. पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन
राजस्थान में जोहड़, तालाब, बावड़ी जैसी प्रणालियाँ सदियों तक जल सुरक्षा देती रही हैं। इनका पुनर्जीवन दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा हो सकता है।
सरकार और समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश क्या है?
यह खबर राजस्थान के लिए चेतावनी है कि सिर्फ अच्छी बारिश से जल संकट खत्म नहीं होगा। जब तक:
- भूजल दोहन नियंत्रित नहीं होगा
- कृषि में पानी का उपयोग नहीं बदलेगा
- वर्षा जल संरक्षण नहीं बढ़ेगा
- और स्थानीय जल प्रणालियों को पुनर्जीवित नहीं किया जाएगा
तब तक संकट और गहराता रहेगा।
यह समय केवल रिपोर्ट पढ़ने का नहीं, बल्कि नीतिगत फैसले, स्थानीय अमल और जनभागीदारी का है।
निष्कर्ष
राजस्थान में भूजल संकट का गहराना एक गंभीर संकेत है। रिकॉर्ड बारिश के बावजूद यदि 70% भूजल इकाइयाँ ओवरएक्सप्लॉइटेड बनी हुई हैं, तो यह साफ है कि समस्या प्राकृतिक कमी से ज्यादा प्रबंधन की विफलता और अत्यधिक निर्भरता से जुड़ी है।
अब जरूरत है कि जल संरक्षण को अभियान नहीं, बल्कि जीवन और विकास नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जाए। क्योंकि अगर जमीन के नीचे का पानी लगातार घटता रहा, तो आने वाले समय में राजस्थान के लिए जल संकट सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य आपदा बन सकता है।

