Quick Highlights: राजस्थान पंचायत चुनाव 2026
| मुख्य विवरण | जानकारी |
| अंतिम तिथि (नतीजे) | 15 अप्रैल 2026 तक |
| सरपंच का चुनाव | बैलेट पेपर (मुहर लगाकर) |
| जिला परिषद चुनाव | EVM के जरिए |
| कुल ट्रेनर्स | 205 (41 जिलों से) |
जयपुर: राजस्थान में एक बार फिर ग्रामीण राजनीति का पारा चढ़ने वाला है। प्रदेश में ग्राम पंचायतों की ‘छोटी सरकार’ चुनने की कवायद शुरू हो चुकी है। राज्य निर्वाचन आयोग ने साल 2026-27 के पंचायत चुनावों के लिए अपनी तैयारियां युद्ध स्तर पर तेज कर दी हैं। हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, आयोग को 15 अप्रैल 2026 तक चुनावी अधिसूचना से लेकर नतीजों तक की पूरी प्रक्रिया संपन्न करनी है।
मास्टर ट्रेनर्स की टीम तैयार, चुनाव की ट्रेनिंग शुरू
चुनावों को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए जयपुर स्थित इंदिरा गांधी पंचायती राज भवन में हाल ही में एक महत्वपूर्ण तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। 5 से 7 फरवरी तक चले इस कार्यक्रम में प्रदेश के सभी 41 जिलों के 205 मास्टर ट्रेनर्स ने हिस्सा लिया।
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने बताया कि इन ट्रेनर्स का काम जिलों में जाकर मतदान अधिकारियों (PO) और प्रथम मतदान अधिकारियों (PRO) को बारीकियों से अवगत कराना है, ताकि मतदान और मतगणना के दौरान किसी भी प्रकार की मानवीय त्रुटि न हो।
इस बार क्या बदलेगा? ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर होंगे चुनाव
2026 के पंचायत चुनाव पिछले एक दशक के मुकाबले काफी अलग और दिलचस्प होने वाले हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने इस बार एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाने का फैसला किया है:
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बैलेट पेपर (मतपत्र): पंच और सरपंच पद के लिए मतदाता पुराने पारंपरिक अंदाज में वोट डालेंगे। यानी अब बटन दबाने के बजाय मतपत्र पर मुहर लगाकर मतपेटी का उपयोग किया जाएगा।
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EVM मशीन: जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान पहले की तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के जरिए ही होगा।
जिला स्तरीय मास्टर ट्रेनर का प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न
पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव सुचारू रूप से कराना मुख्य उद्देश्य -आयुक्त, राज्य निर्वाचन आयोगhttps://t.co/f0iBlIizvc pic.twitter.com/oXQM3kFzaF
— सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, राजस्थान सरकार (@DIPRRajasthan) February 8, 2026
क्यों खास है यह चुनाव?
आयोग का मुख्य फोकस ‘त्रुटिरहित मतदान’ पर है। बैलेट पेपर की वापसी को लेकर माना जा रहा है कि इससे स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और पारंपरिक चुनावी अनुभव बढ़ेगा। प्रशासन के सामने चुनौती समय सीमा के भीतर चुनाव कराने की है, क्योंकि अप्रैल के मध्य तक पूरी प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना अनिवार्य है।

