बीकानेर: राजस्थान के राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ को बचाने के लिए बीकानेर कलेक्ट्रेट के सामने जारी महा-आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले चार दिनों से कड़कड़ाती ठंड और खुले आसमान के नीचे अनशन पर बैठे सैकड़ों पर्यावरण प्रेमियों की सेहत बिगड़ने के बाद प्रशासन और सरकार हरकत में आई है।
गुरुवार को राज्य सरकार के मंत्री के.के. विश्नोई ने आंदोलनकारियों के बीच पहुंचकर एक बड़ी घोषणा की, जिससे पिछले कई दिनों से जारी गतिरोध टूटता नजर आ रहा है।
बिगड़ते हालात: कलेक्ट्रेट के बाहर बने अस्थायी अस्पताल
बुधवार रात अनशनकारियों के लिए काफी भारी रही। भूख और प्यास के कारण करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की तबीयत अचानक बिगड़ गई। इनमें संत लालदास और मांगीलाल जैसे प्रमुख संत भी शामिल थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए:
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आंदोलन स्थल पर 75-75 बेड के दो अस्थायी अस्पताल बनाए गए हैं।
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20 डॉक्टरों और 50 नर्सिंग स्टाफ की टीम को मौके पर तैनात किया गया है।
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तीन प्रदर्शनकारियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें पीबीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
बता दें कि इस अनशन में 18 से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग, 29 संत और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं।
सरकार का झुकना: ‘लिखित आश्वासन’ की बड़ी जीत
मंत्रियों के प्रतिनिधिमंडल और आंदोलनकारियों के बीच हुई मैराथन वार्ता के बाद मंत्री के.के. विश्नोई ने मंच से घोषणा की कि सरकार खेजड़ी संरक्षण के लिए लिखित में आश्वासन देगी।
मंत्री ने कहा, “हम अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। सरकार खेजड़ी की सुरक्षा के लिए ठोस कानूनी कदम उठाने के प्रति गंभीर है।” इस घोषणा को आंदोलनकारियों की नैतिक जीत माना जा रहा है, हालांकि प्रदर्शनकारी अभी भी ‘ट्री एक्ट’ (वृक्ष संरक्षण कानून) के लिखित ड्राफ्ट का इंतजार कर रहे हैं।
क्यों भड़की है आंदोलन की आग? (मुख्य कारण)
पश्चिमी राजस्थान में सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के विस्तार के कारण हजारों खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है।
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अवैध कटाई: आरोप है कि कंपनियां रात के अंधेरे में पेड़ काटकर उन्हें जमीन में गाड़ देती हैं ताकि सबूत मिटाए जा सकें।
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कमजोर कानून: वर्तमान में पेड़ काटने पर मात्र 1000 रुपये का जुर्माना है, जिसे आंदोलनकारी ‘अपराधियों के लिए मजाक’ मानते हैं।
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प्रमुख मांग: इस अपराध को ‘गैर-जमानती’ बनाया जाए और एक सख्त ट्री प्रोटेक्शन एक्ट लागू हो।
राजनीतिक और सामाजिक समर्थन
इस आंदोलन को राजस्थान के कद्दावर नेताओं का भी साथ मिला है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के साथ-साथ शिव विधायक रवींद्र सिंह भाटी ने भी खेजड़ी संरक्षण का समर्थन किया है। सोशल मीडिया पर बिश्नोई समाज के हजारों परिवारों ने एक दिन का उपवास रखकर इस मुहिम को वैश्विक पहचान दी है।
खेजड़ी का महत्व:
खेजड़ी को ‘मरुस्थल की जीवनरेखा’ और ‘थार का कल्पवृक्ष’ कहा जाता है। यह न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरी है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से भी जुड़ा है।
निष्कर्ष: बीकानेर का यह आंदोलन अब केवल पेड़ों को बचाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पर्यावरण और विकास के बीच के संघर्ष का प्रतीक बन गया है। अब देखना यह है कि सरकार लिखित आश्वासन में किन शर्तों को शामिल करती है और क्या ‘ट्री एक्ट’ हकीकत बन पाता है।
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