India Russia Crude Oil Import: वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के बीच भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। भारत ने संकेत दिए हैं कि अमेरिकी छूट समाप्त होने के बाद भी वह रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव Sujata Sharma ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों या छूट की समाप्ति का भारत की आयात रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में ऊर्जा बाजार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तेल सप्लाई पर लगातार दबाव बना हुआ है।
भारत ने क्यों लिया यह फैसला?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है।
ऐसे में सस्ती दरों पर उपलब्ध रूसी कच्चा तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से बेहद अहम बन गया है।
सरकार का मानना है कि अगर सस्ता तेल उपलब्ध है तो उसे खरीदना देशहित में है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने और महंगाई पर काबू पाने में मदद मिलती है।
भारत का यह रुख साफ करता है कि वह वैश्विक राजनीतिक दबाव के बजाय अपनी आर्थिक जरूरतों के आधार पर फैसले लेगा।
अमेरिका ने दी 30 दिनों की अस्थायी राहत
इस बीच United States Department of the Treasury ने समुद्र में फंसे रूसी तेल जहाजों से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों का अस्थायी लाइसेंस जारी किया है।
अमेरिकी ट्रेजरी मंत्री Scott Bessent ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि यह फैसला वैश्विक तेल बाजार को स्थिर बनाए रखने और ऊर्जा संकट से जूझ रहे देशों तक तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है।
यह अस्थायी राहत बाजार में अचानक कीमतों के उछाल को रोकने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।
मई में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रूसी तेल आयात
भारत ने मई महीने में रूस से रिकॉर्ड स्तर पर कच्चे तेल का आयात किया है।
डेटा इंटेलिजेंस एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार भारत ने इस महीने अब तक रोजाना करीब 23 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा है।
यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि पूरे मई महीने का औसत आयात करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है।
यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत अपनी ऊर्जा रणनीति में रूस को कितना अहम मानता है।
अमेरिका की छूट खत्म, फिर भी खरीद जारी
मार्च में अमेरिका ने भारत समेत कुछ देशों को रूस से तेल खरीदने की विशेष छूट दी थी।
इस छूट को बाद में 16 मई तक बढ़ाया गया था।
लेकिन समयसीमा समाप्त होने के बावजूद भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी खरीदारी नीति में कोई बदलाव नहीं होगा।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत अमेरिकी छूट से पहले भी रूस से तेल खरीद रहा था, छूट के दौरान भी खरीदा और आगे भी खरीद जारी रखेगा।
महंगाई रोकने के लिए जरूरी है तेल सप्लाई
भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी प्रशासन को पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि देश की ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
अगर तेल सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।
इससे पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है और घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
सरकार किसी भी हालत में घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ने का जोखिम नहीं लेना चाहती।
रूस भारत के लिए क्यों अहम है?
रूस भारत को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराता है।
यही वजह है कि पिछले दो वर्षों में भारत का रूसी तेल आयात लगातार बढ़ा है।
हालांकि नवंबर में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण आयात में गिरावट आई थी, लेकिन फरवरी के बाद यह हिस्सेदारी फिर तेजी से बढ़कर 30 प्रतिशत तक पहुंच गई।
भारत ने इस मौके का फायदा उठाकर अपनी ऊर्जा लागत को काफी हद तक नियंत्रित किया है।
क्या बढ़ेगा अमेरिका-भारत तनाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह फैसला अमेरिका को असहज कर सकता है, लेकिन दोनों देशों के रणनीतिक रिश्ते इतने मजबूत हैं कि इसका बड़ा कूटनीतिक संकट बनने की संभावना कम है।
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेता है।
वैश्विक बाजार पर क्या होगा असर?
अगर भारत और अन्य बड़े खरीदार रूस से तेल खरीद जारी रखते हैं तो वैश्विक तेल कीमतों में स्थिरता बनी रह सकती है।
लेकिन अगर भविष्य में प्रतिबंध और कड़े हुए तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
इसका असर दुनिया भर में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर दिखाई देगा।
निष्कर्ष
भारत ने एक बार फिर दिखा दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों की समाप्ति के बावजूद रूस से तेल खरीद जारी रखने का फैसला आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्वतंत्रता का संकेत है।
आने वाले महीनों में यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

