नागौर (राजस्थान)
नागौर जिले के गोगेलाव गांव में एक निजी स्कूल के शिक्षक पर कक्षा 5 के छात्र को बुरी तरह पीटने का आरोप है। छात्र कॉपी घर भूल गया था। पुलिस ने परिजनों की शिकायत पर शिक्षक के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। घटना सामने आने के बाद गांव में आक्रोश है।
क्या है पूरा मामला
आरोप है कि गोगेलाव गांव के स्वामी विवेकानंद स्कूल में बच्चा अपनी नोटबुक घर भूल गया था और इसी बात पर शिक्षक जगदीश भोरा ने उसके साथ मारपीट की। घटना 26 सितंबर 2026 की दोपहर करीब 12:30 बजे की बताई गई है।
पीड़ित छात्र हिमांशु के पिता गोर्धनराम प्रजापत की शिकायत के अनुसार, कक्षा में शिक्षक ने कॉपी मांगी तो छात्र ने बताया कि वह घर पर छूट गई है। आरोप है कि शिक्षक ने बच्चे पर झूठ बोलने का इल्जाम लगाया और उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। पिता के मुताबिक शिक्षक ने लकड़ी की लाठी से पिटाई की और बच्चे के बाल भी खींचे।
गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी का भी आरोप
शिकायत में मारपीट के साथ धमकी का भी जिक्र है। आरोप है कि शिक्षक ने गाली-गलौज की और घटना के बारे में किसी को बताने पर दोबारा पीटने और जान से मारने की धमकी दी। इस डर से बच्चे ने घर पहुंचकर भी किसी को कुछ नहीं बताया।
दो दिन तक दर्द सहता रहा मासूम
घर लौटने के बाद बच्चा डर के कारण चुप रहा, पर दर्द और परेशानी बढ़ती गई। रविवार शाम उसने रोते हुए पूरी घटना परिवार को बताई। इस दौरान उसे शरीर में दर्द बना रहा और वह ठीक से बैठ भी नहीं पा रहा था।
बच्चे के शरीर पर चोट के निशान परिजनों को दो दिन बाद दिखे। ETV भारत की रिपोर्ट की हेडलाइन के अनुसार बच्चे के कूल्हों पर 20 से अधिक निशान पाए गए हैं। मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद ही चोटों की वास्तविक प्रकृति और गंभीरता स्पष्ट होगी।
कलेक्टर और पुलिस को शिकायत, 28 सितंबर को FIR
मामले की गंभीरता को देखते हुए पिता गोर्धनराम प्रजापत ने जिला कलेक्टर नागौर और सदर थाना पुलिस को लिखित शिकायत देकर आरोपी शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसके बाद सदर थाना पुलिस ने 28 सितंबर 2026 को मामला दर्ज कर लिया।
किन धाराओं में केस दर्ज हुआ
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2) के तहत स्वेच्छा से चोट पहुंचाने, धारा 126(2) के तहत गलत तरीके से रोकने और धारा 351(2) के तहत आपराधिक धमकी से जुड़ा मामला दर्ज किया है।
पुलिस का पक्ष: जांच जारी, शिक्षक डिटेन
सहायक उप निरीक्षक गरीबराम ने बताया कि शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर जांच की जा रही है और मेडिकल रिपोर्ट सहित अन्य तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी शिक्षक को फिलहाल डिटेन किया गया है। पीड़ित छात्र का अलग से मेडिकल मुआयना कराया जा रहा है और मामले की जांच सउनि शिवदेवराम को सौंपी गई है।
फिलहाल आरोपी शिक्षक या स्कूल प्रबंधन का पक्ष मीडिया रिपोर्ट्स में सामने नहीं आया है। पूरा मामला अभी आरोपों के स्तर पर है और जांच के बाद ही तथ्य साफ होंगे।
गांव में आक्रोश
घटना के बाद गांव में नाराजगी का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार अस्वीकार्य है और मामले में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। कई अभिभावकों ने भी कहा कि स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित जगह होनी चाहिए और अनुशासन के नाम पर हिंसा किसी हाल में जायज नहीं ठहराई जा सकती।
कानून क्या कहता है: स्कूलों में शारीरिक दंड पर प्रतिबंध
देश में बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनन प्रतिबंधित है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न देने से रोकती है और इसका उल्लंघन करने वाले के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) भी स्कूलों में शारीरिक दंड रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे मामले लगातार आते रहते हैं।
राजस्थान में ही हाल के महीनों में इसी तरह की घटनाएं सामने आई हैं। बाड़मेर के चौहटन में एक निजी स्कूल में कॉपी घर भूलने पर गणित शिक्षक द्वारा चौथी कक्षा के 9 वर्षीय छात्र की डंडे से पिटाई का मामला जुलाई में सामने आया था, जिसमें परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज किया था। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि छोटी-छोटी बातों पर बच्चों पर हाथ उठाने की प्रवृत्ति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
विशेषज्ञों की राय: डर से नहीं, संवाद से सीखते हैं बच्चे
बाल मनोविज्ञान के जानकारों का मानना है कि शारीरिक सजा से बच्चे सीखते नहीं, डरना सीखते हैं। इसका असर उनकी पढ़ाई, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक रह सकता है। इस मामले में भी बच्चा धमकी और डर के कारण दो दिन तक चुप रहा, जो ऐसी घटनाओं का एक गंभीर पहलू है। कई बार बच्चे शिक्षक के डर से घटना छिपा लेते हैं, इसलिए अभिभावकों को बच्चों से खुलकर बात करने और उनके व्यवहार में आए बदलाव पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
अभिभावकों के लिए कुछ जरूरी बातें:
- बच्चा अचानक स्कूल जाने से डरे, चुपचाप रहने लगे या ठीक से बैठ-चल न पाए तो उसे नजरअंदाज न करें।
- बच्चे को भरोसा दिलाएं कि वह किसी भी घटना के बारे में बेझिझक बता सकता है।
- चोट के निशान दिखें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं और स्कूल प्रबंधन व पुलिस को लिखित शिकायत दें।
- जरूरत पड़ने पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग या जिला प्रशासन से भी संपर्क किया जा सकता है।
आगे क्या
अब सबकी नजर पुलिस जांच और मेडिकल रिपोर्ट पर है। रिपोर्ट में चोटों की पुष्टि होने पर आरोपी शिक्षक की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। साथ ही शिक्षा विभाग से भी अपेक्षा की जा रही है कि वह निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और शारीरिक दंड पर रोक के नियमों की सख्ती से निगरानी करे। ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि दोषी पाए जाने पर शिक्षक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई बच्चा इस तरह की प्रताड़ना का शिकार न बने।

