मुख्य बिंदु: एक नज़र में
| विषय | विवरण |
| नया टैरिफ रेट | भारतीय सामानों पर घटाकर 18% किया गया। |
| विवाद का मुद्दा | रूस से कच्चे तेल का आयात (ट्रंप का दावा बनाम भारत की चुप्पी)। |
| टर्निंग पॉइंट | भारत-EU व्यापार समझौता, जिसने अमेरिका पर दबाव बनाया। |
| अगला कदम | ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देना और निर्यात में सुधार। |
काफी समय से अधर में लटकी भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील ने अचानक रफ्तार पकड़ ली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक चौंकाने वाले एलान के साथ ही महीनों से चला आ रहा गतिरोध खत्म होता दिख रहा है। हालांकि, इस डील की शर्तों और इसके पीछे की कूटनीति को लेकर कई बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
ट्रंप का दावा और भारत की चुप्पी
हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया कि भारत अब रूस से कच्चा तेल (Crude Oil) खरीदना बंद करने पर सहमत हो गया है। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इस बात पर जोर दे रहा था कि कोई भी व्यापारिक समझौता तभी संभव है जब नई दिल्ली मॉस्को से अपनी तेल निर्भरता खत्म करे।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस डील का स्वागत तो किया, लेकिन उन्होंने रूस से तेल आयात के मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की। पीएम मोदी ने मुख्य रूप से भारतीय सामानों पर टैरिफ घटाकर 18% किए जाने के फैसले पर ध्यान केंद्रित किया, जो पहले 50% तक पहुँच गए थे।
क्यों झुका अमेरिका? ‘यूरोपीय संघ’ वाला एंगल
विशेषज्ञों और ‘न्यूज वीक’ के विश्लेषण की मानें, तो अमेरिका के इस फैसले के पीछे भारत-यूरोपीय संघ (India-EU) फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) का बड़ा हाथ है।
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दबाव की राजनीति: भारत ने हाल ही में ब्रुसेल्स (EU) के साथ एक ‘ऐतिहासिक’ व्यापार समझौता पूरा किया है।
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मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स: भारत और यूरोपीय संघ दोनों ने ही इस समझौते को ‘व्यापारिक समझौतों की जननी’ बताया है।
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साइडलाइन होने का डर: जब पीएम मोदी ने यूरोपीय संघ के साथ डील को विकास और निवेश का नया रास्ता बताया, तो ट्रंप प्रशासन को लगा कि भारत के बड़े बाजार में अमेरिका पीछे छूट सकता है। इसी ‘फोमो’ (छूट जाने का डर) ने अमेरिका को पहले कदम उठाने पर मजबूर किया।
“बदल रही है दुनिया की दिशा” – पीएम मोदी
संसद में सांसदों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया की व्यवस्था अब भारत की ओर झुक रही है। उन्होंने कहा:
“लोगों ने टैरिफ की आलोचना की, लेकिन हमने धैर्य रखा। आज वैश्विक तनाव के बीच भी भारत को जो लाभ मिल रहा है, वह हमारी मजबूत होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है।”
प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि अब इस व्यापार समझौते का सीधा लाभ घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) को मिलना चाहिए, ताकि भारत की औद्योगिक वृद्धि को नई ऊंचाई मिल सके।
आगे क्या?
यह समझौता भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या भारत वास्तव में रूस से तेल आयात कम करता है या अपनी ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ पर कायम रहते हुए दोनों महाशक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखता है।

