Supreme Court warns Meta and WhatsApp: “अगर नियम पसंद नहीं, तो भारत छोड़ दें”- प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट ने Meta और WhatsApp को लगाई कड़ी फटकार

Channelindiaone
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नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्राइवेसी और डेटा शेयरिंग के मुद्दे पर दिग्गज टेक कंपनी Meta (WhatsApp) के खिलाफ अब तक का सबसे सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापार के नाम पर भारतीय नागरिकों की गोपनीयता (Privacy) के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कड़े शब्दों में कहा, “अगर आप यहां के लोगों की प्राइवेसी का सम्मान नहीं कर सकते, तो आप भारत से जा सकते हैं।”

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद WhatsApp की 2021 की उस प्राइवेसी पॉलिसी से शुरू हुआ था, जिसमें यूजर्स के डेटा को Meta के अन्य प्लेटफॉर्म्स (जैसे Facebook और Instagram) के साथ साझा करने की बात कही गई थी।

  • CCI का एक्शन: नवंबर 2024 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने WhatsApp पर 213 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

  • आरोप: CCI का कहना था कि WhatsApp अपनी मजबूत स्थिति का फायदा उठाकर यूजर्स को डेटा शेयर करने के लिए मजबूर कर रहा है।

  • कानूनी लड़ाई: हालांकि Meta ने इस जुर्माने को जमा कर दिया है, लेकिन कंपनी ने इस आदेश को चुनौती दी थी, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई।


“ग्रामीण बिहार या तमिलनाडु की महिला कैसे समझेगी आपकी नीति?”

सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp की जटिल प्राइवेसी नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये नीतियां आम आदमी की समझ से परे हैं। कोर्ट ने कुछ चुभते हुए सवाल किए:

  1. जटिल भाषा: “आपकी नीतियां इतनी उलझी हुई हैं कि कभी-कभी हमें भी समझने में दिक्कत होती है। ऐसे में बिहार के किसी गांव में रहने वाला व्यक्ति या तमिलनाडु का कोई रेहड़ी-पटरी वाला इसे कैसे समझेगा?”

  2. निजी जानकारी की चोरी: कोर्ट ने ‘ऑप्ट-आउट’ (नियमों से बाहर निकलने) के विकल्प को अपर्याप्त बताते हुए इसे निजी जानकारी की चोरी का एक तरीका करार दिया।

  3. टारगेटेड विज्ञापन: चीफ जस्टिस ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि अगर कोई WhatsApp पर डॉक्टर को अपनी बीमारी बताता है, तो तुरंत उसे दवाओं के विज्ञापन दिखने लगते हैं। यह प्राइवेसी में सीधा दखल है।


Meta की सफाई: “मैसेज पूरी तरह सुरक्षित हैं”

Meta की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों (मुकुल रोहतगी और अखिल सिब्बल) ने दलील दी कि WhatsApp के सभी मैसेज ‘एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड’ हैं। इसका मतलब है कि खुद कंपनी भी यह नहीं देख सकती कि यूजर्स क्या बात कर रहे हैं। हालांकि, कोर्ट इस दलील से संतुष्ट नजर नहीं आया और डेटा शेयरिंग के बड़े ढांचे पर चिंता जताई।

भविष्य पर क्या होगा असर?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने बड़ी टेक कंपनियों के लिए एक कड़ा संदेश भेजा है। भारत सरकार और न्यायपालिका अब ‘डेटा संप्रभुता’ (Data Sovereignty) को लेकर बेहद गंभीर हैं।

मुख्य निष्कर्ष:

  • नागरिकों का प्राइवेसी का अधिकार सर्वोपरि है।

  • कंपनियां तकनीक की आड़ में मनमानी शर्तें नहीं थोप सकतीं।

  • जटिल कानूनी भाषा का इस्तेमाल कर यूजर्स की सहमति लेना ‘धोखा’ माना जा सकता है।

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